श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 179: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  3.179.53-54 
स गत्वा तैस्तदा चिह्नैर्ददर्श गिरिगह्वरे।
रूक्षमारुतभूयिष्ठे निष्पत्रद्रुमसंकुले॥ ५३॥
ईरिणे निर्जले देशे कण्टकिद्रुमसंकुले।
अश्मस्थाणुक्षुपाकीर्णे सुदुर्गे विषमोत्कटे।
गृहीतं भुजगेन्द्रेण निश्चेष्टमनुजं तदा॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
फिर उसने उन पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए पर्वत की गुफा में अपने भाई भीमसेन को देखा, जो एक अजगर के चंगुल में फँसकर मूर्छित हो गए थे। उक्त पर्वत की गुफा में विशेष रूप से शुष्क हवा चलती थी। वह गुफा ऐसे वृक्षों से आच्छादित थी जिनमें पत्तों का लेश मात्र भी नहीं था। इतना ही नहीं, वह स्थान बंजर, जलहीन, काँटेदार वृक्षों से युक्त, पत्थरों, ठूँठों और छोटे वृक्षों से ढका हुआ, अत्यन्त दुर्गम और ऊबड़-खाबड़ था।
 
Then he followed those footprints and saw his brother Bhimasena in the cave of the mountain, who had become unconscious after being caught in the clutches of a python. A particularly dry wind used to blow in the cave of the said mountain. That cave was covered with trees which did not have even a trace of leaves. Not only this, that place was barren, waterless, full of thorny trees, covered with stones, stumps and small trees, very inaccessible and uneven. 53-54.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरभीमदर्शने एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरको भीमसेनके दर्शनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)