श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 179: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.179.39 
एवंविधं बहु तदा विललाप वृकोदर:।
भुजङ्गभोगसंरुद्धो नाशकच्च विचेष्टितुम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! उस समय भीमसेन ने ऐसी बहुत सी बातें कहीं और बहुत देर तक विलाप करते रहे। वे सर्प के शरीर में ऐसे उलझ गए थे कि हिल भी नहीं सकते थे।
 
Janamejaya! At that time Bhimasena said many such things and lamented for a long time. He was so entangled in the body of the snake that he could not even move.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)