श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 179: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.179.29 
किंतु नाद्यानुशोचामि तथाऽऽत्मानं विनाशितम्।
यथा तु विपिने न्यस्तान् भ्रातॄन् राज्यपरिच्युतान्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'परन्तु आज मैं अपनी मृत्यु के लिए उतना शोक नहीं कर रहा हूँ जितना अपने उन भाइयों के लिए कर रहा हूँ जो राज्य से वंचित होकर वन में पड़े हैं॥29॥
 
'But today I am not grieving for my death as much as I am grieving for my brothers who are deprived of their kingdom and are lying in the forest.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)