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mahabharat 3.179.27: ऐसा कौन पुरुष है जो अपने पुरुषार्थ के बल से भाग्य को परास्त कर सके? मैं भाग्य को ही सबसे बड़ा और पुरुषार्थ को ही व्यर्थ मानता हूँ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 3.179: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 179: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.179.27 
दैवं पुरुषकारेण को वञ्चयितुमर्हति।
दैवमेव परं मन्ये पुरुषार्थो निरर्थक:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कौन पुरुष है जो अपने पुरुषार्थ के बल से भाग्य को परास्त कर सके? मैं भाग्य को ही सबसे बड़ा और पुरुषार्थ को ही व्यर्थ मानता हूँ॥27॥
 
‘Who is such a man who can defeat destiny by the power of his efforts? I consider destiny to be the greatest and efforts are futile.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)