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वैशम्पायन उवाच
स भीमसेनस्तेजस्वी तथा सर्पवशं गत:।
चिन्तयामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्भुतं महत्॥ १॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार सर्प के वश में हुए तेजस्वी भीमसेन उस सर्प की अद्भुत शक्ति के विषय में सोचने लगे॥1॥
Vaishampayanji says- Janamejaya! Thus, that brilliant Bhimsen, who was under the control of the snake, started thinking about the amazing power of that snake. 1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥