श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 179: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.179.1 
वैशम्पायन उवाच
स भीमसेनस्तेजस्वी तथा सर्पवशं गत:।
चिन्तयामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्‍भुतं महत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार सर्प के वश में हुए तेजस्वी भीमसेन उस सर्प की अद्भुत शक्ति के विषय में सोचने लगे॥1॥
 
Vaishampayanji says- Janamejaya! Thus, that brilliant Bhimsen, who was under the control of the snake, started thinking about the amazing power of that snake. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)