श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 177: पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.177.18 
तत्राससादातिबलं भुजङ्गं
क्षुधार्दितं मृत्युमिवोग्ररूपम्।
वृकोदर: पर्वतकन्दरायां
विषादमोहव्यथितान्तरात्मा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उस यात्रा में एक दिन भीमसेन पर्वत की एक गुफा में पहुँचे, जहाँ उन्हें एक अजगर मिला जो भूख से व्याकुल, अत्यन्त बलवान तथा मृत्यु के समान भयंकर था। उस समय उनका मन शोक और मोह से भर गया॥18॥
 
During that journey, one day Bhimsena reached a cave in the mountain where he came across a python who was starving and very strong and was as dangerous as death. At that time his soul was filled with sorrow and attachment.॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)