श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 177: पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.177.1 
वैशम्पायन उवाच
नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं
दिशां गजैै: किन्नरपक्षिभिश्च।
सुखं निवासं जहतां हि तेषां
न प्रीतिरासीद् भरतर्षभाणाम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: 'हे जनमेजय! अनेक झरनों से सुशोभित तथा दैत्यों, किन्नरों और पक्षियों से सुशोभित महान गंधमादन पर्वत भरतश्रेष्ठ पाण्डवों के लिए सुखदायक निवासस्थान था। उसे त्यागकर उनका मन प्रसन्न नहीं हुआ॥ 1॥
 
Vaishmpayana says: 'O Janamejaya! The great mountain Gandhamadana, being adorned with numerous springs and being well served by giants, kinnaras and birds, was a pleasant abode for the Pandavas, the best of the Bharatas. Their mind was not happy when they left it.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)