श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 176: भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.176.12-13 
कीर्तिस्तु ते भारत पुण्यगन्धा
नश्येद्धि लोकेषु चराचरेषु।
तत् प्राप्य राज्यं कुरुपुङ्गवानां
शक्यं महत् प्राप्तुमथ क्रियाश्च॥ १२॥
इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र
प्राप्तुं त्वया यल्लभसे कुबेरात्।
कुरुष्व बुद्धिं द्विषतां वधाय
कृतागसां भारत निग्रहे च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
किन्तु यदि ऐसा हुआ, तो जड़-चेतन जगत में आपकी पुण्य कीर्ति नष्ट हो जाएगी। अतः हम अपने पूर्वजों के उस महान राज्य, कुरुवंश के अधिपति को प्राप्त करके ही कोई अन्य पुण्य कार्य करने में समर्थ हो सकते हैं। भरतकुलभूषण महाराज! कुबेर से जो मान-सम्मान और कृपा आपको मिल रही है, वह आपको सदैव प्राप्त होती रहेगी। अभी तो आप अपराधी शत्रुओं को मारकर दण्ड देने का निश्चय कीजिए।॥12-13॥
 
‘But if this happens, your pious fame will be destroyed in the animate and inanimate world. Therefore, we can be capable of doing any other good deed only after attaining that great kingdom of our ancestors, the head of the Kuru dynasty. Bharatkulbhushan Maharaj! The honour and favour that you are getting from Kubera, you can always get it. For now, decide to kill and punish the guilty enemies.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)