vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 174: अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना
»
श्लोक 4
श्लोक
3.174.4
इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभु:।
अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम्॥ ४॥
अनुवाद
महाराज! उन इन्द्रदेव ने ही मेरे शरीर की रक्षा के लिए यह अभेद्य दिव्य कवच तथा यह स्वर्णमाला मुझे दी है॥4॥
Maharaj! That God Indra himself gave me this impenetrable divine armor to protect my body and this golden garland. 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×