श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 174: अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.174.17 
वैशम्पायन उवाच
एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजय:।
भ्रातृभि: सहित: सर्वै रजनीं तामुवास ह॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! इस प्रकार अपने आगमन का वृत्तांत सुनाकर अर्जुन ने अपने सभी भाइयों के साथ वहीं रात्रि बिताई।
 
Vaishmpayana says: O King! Having thus narrated the story of his arrival, Arjuna along with all his brothers spent the night there.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते चतु:सप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनके लिये संकेतविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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