श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 174: अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.174.15 
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्ट्रुं दिव्यानि भारत।
यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवातकवचा हत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
भरत! अब मैं उन दिव्यास्त्रों को देखना चाहता हूँ जिनसे तुमने उन महाबली निवातकवों को नष्ट किया है॥15॥
 
Bharata! Now I desire to see the divine weapons with which you have destroyed those mighty Nivatakavas. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)