श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 174: अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  3.174.11-12 
युधिष्ठिर उवाच
दिष्टॺा धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत।
दिष्टॺा चाराधितो राजा देवानामीश्वर: प्रभु:॥ ११॥
दिष्टॺा च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप।
साक्षाद् दृष्ट: स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ॥ १२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - धनंजय! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हें दिव्यास्त्र प्राप्त हुए हैं। भरत! यह भी सौभाग्य की बात है कि तुमने देवताओं के स्वामी, राजराज इन्द्र की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया है। हे पापरहित और पुण्यात्मा! सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुमने देवी पार्वती सहित साक्षात भगवान शंकर के दर्शन किए हैं और अपनी युद्धकला से उन्हें संतुष्ट किया है। ॥11-12॥
 
Yudhishthira said - Dhananjay! It is a matter of great fortune that you have acquired divine weapons. Bharat! It is also a matter of fortune that you have pleased the lord of gods, King of kings Indra, by worshipping him. Sinless and pious! The greatest fortune is that you have seen Lord Shankar in person along with Goddess Parvati and satisfied him with your martial arts. ॥ 11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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