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mahabharat 3.173.9-12: राजेन्द्र! उन दोनों ने यह भी प्रार्थना की कि ‘हमारे पुत्र देवता, दानव और नागों के लिए भी अविनाशी हों। उनके रहने के लिए एक सुन्दर नगर हो, जो अपनी महान ज्योति से जगमगाता हो। वह नगर विमान के समान आकाश में विचरण करने में समर्थ हो, उसमें सभी प्रकार के रत्नों का संग्रह हो, देवता, महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर और राक्षस कोई भी उसे नष्ट न कर सके। वह नगर समस्त मनोवांछित गुणों से युक्त, शोक और रोग आदि से रहित हो।’ भरतश्रेष्ठ! भगवान ब्रह्मा ने कालकेयगणों के लिए भी ऐसा ही एक नगर निर्मित किया था। यह वही दिव्य दिव्य नगर है, जो सर्वत्र विचरण करता है। इसमें देवताओं का प्रवेश नहीं है। वीर! इसमें केवल पौलोम और कालकंज नामक दैत्य ही निवास करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.173: अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 173: अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन  »  श्लोक 9-12
 
 
श्लोक  3.173.9-12 
अवध्यतां च राजेन्द्र सुरराक्षसपन्नगै:।
पुरं सुरमणीयं च खचरं सुमहाप्रभम्॥ ९॥
सर्वरत्नै: समुदितं दुर्धर्षममरैरपि।
महर्षियक्षगन्धर्वपन्नगासुरराक्षसै:॥ १०॥
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम्।
ब्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेयकृते कृतम्॥ ११॥
तदेतत् खपुरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम्।
पौलोमाध्युषितं वीर कालकञ्जैश्च दानवै:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उन दोनों ने यह भी प्रार्थना की कि ‘हमारे पुत्र देवता, दानव और नागों के लिए भी अविनाशी हों। उनके रहने के लिए एक सुन्दर नगर हो, जो अपनी महान ज्योति से जगमगाता हो। वह नगर विमान के समान आकाश में विचरण करने में समर्थ हो, उसमें सभी प्रकार के रत्नों का संग्रह हो, देवता, महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर और राक्षस कोई भी उसे नष्ट न कर सके। वह नगर समस्त मनोवांछित गुणों से युक्त, शोक और रोग आदि से रहित हो।’ भरतश्रेष्ठ! भगवान ब्रह्मा ने कालकेयगणों के लिए भी ऐसा ही एक नगर निर्मित किया था। यह वही दिव्य दिव्य नगर है, जो सर्वत्र विचरण करता है। इसमें देवताओं का प्रवेश नहीं है। वीर! इसमें केवल पौलोम और कालकंज नामक दैत्य ही निवास करते हैं।
 
Rajendra! Both of them also prayed that 'our sons should be indestructible even to gods, demons and snakes. There should be a beautiful city for them to live in, which is shining with its great light. That city should be able to move in the sky like a plane, it should have accumulation of all types of gems, none of the Gods, Maharishis, Yakshas, ​​Gandharvas, Nagas, Asuras and Rakshasas should be able to destroy it. That city should be full of all the desired qualities, free from sorrows and diseases etc.' Bharatshrestha! Lord Brahma had built a similar city for the Kalkeys. This is the same celestial celestial city, which roams everywhere. There is no entry of gods in it. Brave! Only demons named Paulom and Kalkanj reside in it. 9-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)