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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 173: अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  3.173.41-42 
यत् तद् रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम्॥ ४१॥
(महत् पाशुपतं दिव्यं सर्वलोकनमस्कृतम्।)
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम्।
त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
इसे 'रौद्रास्त्र' भी कहते हैं। यह समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला है। वह महान एवं दिव्य पाशुपतास्त्र सम्पूर्ण जगत में पूजनीय है। इसका प्रयोग करते ही मुझे एक दिव्य पुरुष दिखाई दिया जिसके तीन सिर, तीन मुख, नौ नेत्र और छह भुजाएँ थीं। उसका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था। उसके सिर के बाल सूर्य के समान प्रज्वलित थे। 41-42.
 
It is also called 'Raudrastra'. It destroys all enemies. That great and divine Pashupatastra is worthy of worship in the entire world. As soon as I used it, I saw a divine man who had three heads, three faces, nine eyes and six arms. His appearance was very radiant. The hair on his head was blazing like the sun. 41-42.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)