श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 172: निवातकवचोंका संहार  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.172.18 
हतैर्निवातकवचैर्निरस्तै: पर्वतोपमै:।
समाच्छाद्यत देश: स विकीर्णैरिव पर्वतै:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ गिरे हुए शवों के पर्वताकार शरीर इधर-उधर बिखरे हुए प्रतीत हो रहे थे। सारा क्षेत्र उनकी लाशों से पट गया था॥18॥
 
The mountain-like bodies of the dead bodies that had fallen there looked like mountains scattered here and there. The entire area was strewn with their corpses.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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