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mahabharat 3.170.17-18: निवातकवच लोग युद्ध में हमारे साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। यद्यपि मैं बाणों के प्रहारों से पीड़ित था, फिर भी उन्होंने भारी बाणों की वर्षा करके मेरी गति को रोकने का प्रयत्न किया। तब मैंने ब्रह्मास्त्र से उन्हें अभिमंत्रित करके अद्भुत एवं तीव्र गति वाले बाण छोड़े और उनसे शीघ्र ही सैकड़ों-हजारों दैत्यों का संहार करने लगा॥17-18॥   |   mahabharat अध्याय 3.170: अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 170: अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  3.170.17-18 
स्पर्धमाना इवास्माभिर्निवातकवचा रणे।
शरवर्षै: शरार्तं मां महद्भि: प्रत्यवारयन्॥ १७॥
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैर्ब्रह्मास्त्रपरिमन्त्रितै:।
व्यधमं सायकैराशु शतशोऽथ सहस्रश:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
निवातकवच लोग युद्ध में हमारे साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। यद्यपि मैं बाणों के प्रहारों से पीड़ित था, फिर भी उन्होंने भारी बाणों की वर्षा करके मेरी गति को रोकने का प्रयत्न किया। तब मैंने ब्रह्मास्त्र से उन्हें अभिमंत्रित करके अद्भुत एवं तीव्र गति वाले बाण छोड़े और उनसे शीघ्र ही सैकड़ों-हजारों दैत्यों का संहार करने लगा॥17-18॥
 
The Nivatakavachas were competing with us in the battle. Even though I was suffering from the blows of arrows, they tried to stop my progress by showering heavy arrows. Then I fired wonderful and fast moving arrows after invoking them with Brahmastra and soon started killing hundreds and thousands of demons with them.॥17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)