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mahabharat 3.170.14-15: राजन! फिर मैंने उस रणभूमि में विचित्र और शीघ्रगामी बाणों द्वारा सैकड़ों-हजारों बाहुओं वाले राक्षसों को मार डाला। शत्रुराज! इस प्रकार इन्द्र का सारथि वीर मातलि पूर्ण प्रयत्नपूर्वक रणभूमि में आगे बढ़ता हुआ मुझ पर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। 14-15॥   |   mahabharat अध्याय 3.170: अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 170: अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  3.170.14-15 
ततोऽहं लघुभिश्चित्रैरस्त्रैस्तानसुरान् रणे।
चिच्छेद सायुधान् राजन् शतशोऽथ सहस्रश:॥ १४॥
एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन्।
प्रीतिमानभवद् वीरो मातलि: शक्रसारथि:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
राजन! फिर मैंने उस रणभूमि में विचित्र और शीघ्रगामी बाणों द्वारा सैकड़ों-हजारों बाहुओं वाले राक्षसों को मार डाला। शत्रुराज! इस प्रकार इन्द्र का सारथि वीर मातलि पूर्ण प्रयत्नपूर्वक रणभूमि में आगे बढ़ता हुआ मुझ पर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। 14-15॥
 
Rajan! Then I killed hundreds and thousands of armed demons in that battlefield with strange and fast-moving arrows. Enemy King! In this way, the brave warrior Matali, the charioteer of Indra, was very pleased with me while moving through the battle with full effort. 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)