श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 17: प्रद्युम्न और शाल्वका घोर युद्ध  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  3.17.1-3 
वासुदेव उवाच
एवमुक्त्वा रौक्मिणेयो यादवान् भरतर्षभ।
दंशितैर्हरिभिर्युक्तं रथमास्थाय काञ्चनम्॥ १॥
उच्छ्रित्य मकरं केतुं व्यात्ताननमिवान्तकम्।
उत्पतद्भिरिवाकाशं तैर्हयैरन्वयात् परान्॥ २॥
विक्षिपन्नादयंश्चापि धनु: श्रेष्ठं महाबल:।
तूणखड्गधर: शूरो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हे भरतश्रेष्ठ! यादवों से ऐसा कहकर रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न कवचयुक्त घोड़ों से जुते हुए स्वर्णमय रथ पर आरूढ़ हुए। उन्होंने मगरमच्छ से अंकित अपनी ध्वजा फहराई, जो उलटे हुए मृत्यु के मुख के समान प्रतीत हो रही थी। उनके रथ के घोड़े ऐसे चल रहे थे मानो आकाश में उड़ रहे हों। ऐसे घोड़ों से जुते हुए रथ से पराक्रमी प्रद्युम्न ने शत्रुओं पर आक्रमण किया। उन्होंने अपने उत्तम धनुष को बार-बार खींचा और उसकी ध्वनि करते हुए आगे बढ़े। उन्होंने अपनी पीठ पर तरकस और कमर में तलवार बाँध रखी थी। वे वीरता से परिपूर्ण थे और छिपकली की खाल से बने दस्ताने पहने हुए थे।
 
Lord Krishna says - O best of the Bharatas! Having said this to the Yadavas, Rukmini's son Pradyumna mounted a golden chariot drawn by armored horses. He raised his flag marked with a crocodile, which looked like the face of death turned upside down. The horses of his chariot moved as if they were flying in the sky. With a chariot drawn by such horses, the mighty Pradyumna attacked the enemies. He repeatedly drew his excellent bow and advanced forward making its sound. He had tied a quiver on his back and a sword at his waist. He was full of bravery and was wearing gloves made of lizard's skin. 1-3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)