श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 169: अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  3.169.23-24 
ततो देवर्षयश्चैव तथान्ये च महर्षय:।
ब्रह्मर्षयश्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे॥ २३॥
ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जयैषिण:।
अस्तुवन् मुनयो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामये॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उस समय बहुत से ऋषि, महर्षि, ब्रह्म ऋषि और सिद्धगण उस महायुद्ध को देखने आए। वे सभी मेरी विजय चाहते थे। अतः जिस प्रकार उन्होंने तारका युद्ध के अवसर पर इंद्र की स्तुति की थी, उसी प्रकार उन्होंने अनुकूल एवं मधुर वचनों से मेरी भी स्तुति की। 23-24
 
At that time many sages, great sages, Brahma sages and Siddhas came to see that great war. All of them wanted my victory. So, just as they had praised Indra on the occasion of the battle of Taraka, they also praised me in the same way with favorable and sweet words. 23-24.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि युद्धारम्भे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १६९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें युद्धारम्भविषयक

एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६९॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)