श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 169: अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  3.169.17-18 
ततो विचार्य बहुशो रथमार्गेषु तान् हयान्।
प्राचोदयत् समे देशे मातलिर्भरतर्षभ॥ १७॥
तेन तेषां प्रणुन्नानामाशुत्वाच्छीघ्रगामिनाम्।
नान्वपश्यं तदा किंचित् तन्मेऽद्‍भुतमिवाभवत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! उस समय मातलि ने बहुत सोच-विचारकर अपने घोड़ों को उन मैदानों में हाँका जहाँ रथों के लिए उपयुक्त स्थान थे। उसके हाँकने पर वे वेगवान घोड़े इतनी तीव्र गति से चले कि उस समय मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यह एक अद्भुत बात थी।
 
O best of the Bharatas! At that time Matali after much thought drove his horses on the plains where chariots were suitable. On his driving those swift horses moved so fast that I could not see anything at that time. This was an amazing thing.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)