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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 169: अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ  »  श्लोक 14-16
 
 
श्लोक  3.169.14-16 
ततो निवातकवचा: सर्व एव स्वलंकृता:।
दंशिता विविधैस्त्राणैर्विचित्रायुधपाणय:॥ १४॥
आयसैश्च महाशूलैर्गदाभिर्मुसलैरपि।
पट्टिशै: करवालैश्च रथचक्रैश्च भारत॥ १५॥
शतघ्नीभिर्भुशुण्डीभि: खड्गैश्चित्रै: स्वलंकृतै:।
प्रगृहीतैर्दिते: पुत्रा: प्रादुरासन् सहस्रश:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
भरत! तत्पश्चात् निवातकवचन नामक सम्पूर्ण राक्षस आभूषणों से विभूषित होकर, नाना प्रकार के कवच धारण करके, हाथों में विचित्र अस्त्र-शस्त्र, बड़े-बड़े लोहे के भाले, गदा, मूसल, ढाल, तलवार, रथ के पहिये, तोपें, भुशुण्डि (बंदूकें) और विचित्र रत्नजटित तलवारें आदि लेकर हजारों की संख्या में नगर से बाहर निकल आए।
 
Bharata! Thereafter all the demons named Nivatakavachana, adorned with ornaments and wearing different kinds of armour, carrying strange weapons in their hands, large iron spears, maces, pestles, shields, swords, chariot-wheels, cannons, bhushundi (guns) and strange jeweled swords etc., came out of the city in thousands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)