Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.168.85-86: यह वही शंख है जिसे मैंने अपनी विजय के लिए धारण किया था। यह मुझे देवताओं ने दिया था, इसलिए इसका नाम देवदत्त है। इस शंख को लेकर और देवताओं के मुख से अपनी स्तुति सुनकर मैं कवच, बाण और धनुष से सुसज्जित होकर युद्ध की इच्छा से महाभयंकर राक्षसों के नगर की ओर चल पड़ा।   |   mahabharat अध्याय 3.168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन  »  श्लोक 85-86
 
 
श्लोक  3.168.85-86 
प्रदीयमानं देवैस्तं देवदत्तं जलोद्भवम्।
प्रत्यगृह्णं जयायैनं स्तूयमानस्तदामरै:॥ ८५॥
स शङ्खी कवची बाणी प्रगृहीतशरासन:।
दानवालयमत्युग्रं प्रयातोऽस्मि युयुत्सया॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
यह वही शंख है जिसे मैंने अपनी विजय के लिए धारण किया था। यह मुझे देवताओं ने दिया था, इसलिए इसका नाम देवदत्त है। इस शंख को लेकर और देवताओं के मुख से अपनी स्तुति सुनकर मैं कवच, बाण और धनुष से सुसज्जित होकर युद्ध की इच्छा से महाभयंकर राक्षसों के नगर की ओर चल पड़ा।
 
This is the same conch which I had taken for my victory. It was given to me by the gods, hence its name is Devadatta. Taking the conch and listening to my praise from the mouth of the gods, I, equipped with armour, arrows and bow, set out towards the city of the most fearsome demons with the desire of fighting. 85-86.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनवाक्ये अष्टषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)