Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.168.56-57: इतना ही नहीं, उन्होंने बड़े आदर के साथ मेरे शरीर के अंगों को स्पर्श किया। हे भरतश्रेष्ठ, यज्ञों में पूर्ण दक्षिणा देने वाले, मैं देवताओं और गंधर्वों के साथ उस स्वर्ग में शस्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए रहने लगा और प्रतिदिन शस्त्रास्त्र का अभ्यास करने लगा। उस समय गंधर्वराज विश्वावसु के पुत्र चित्रसेन के साथ मेरी मित्रता हो गई थी। 56-57। | mahabharat अध्याय 3.168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इतना ही नहीं, उन्होंने बड़े आदर के साथ मेरे शरीर के अंगों को स्पर्श किया। हे भरतश्रेष्ठ, यज्ञों में पूर्ण दक्षिणा देने वाले, मैं देवताओं और गंधर्वों के साथ उस स्वर्ग में शस्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए रहने लगा और प्रतिदिन शस्त्रास्त्र का अभ्यास करने लगा। उस समय गंधर्वराज विश्वावसु के पुत्र चित्रसेन के साथ मेरी मित्रता हो गई थी। 56-57।
Not only this, he touched my body parts with great respect. O best of the Bharatas, who gives full dakshina in sacrifices, started living in that heaven with the gods and Gandharvas to acquire the knowledge of weapons and started practising weapons daily. At that time I had become friends with Chitrasen, the son of Gandharva king Vishwavasu. 56-57.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥