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mahabharat 3.168.44-46: मुझे अनन्त कांतिवाले गन्धर्वों और अप्सराओं का प्रभाव भी देखने को मिला । फिर इन्द्रसारथि मातलि ने शीघ्र ही मुझे नंदन आदि देवताओं के वन और उद्यान दिखाए । तत्पश्चात मैंने अमरावतीपुरी और इन्द्रभवन देखे । वह नगर दिव्य वृक्षों और रत्नों से सुशोभित था, जो इच्छानुसार फल देने वाले थे । वहाँ सूर्य का ताप नहीं है, शीत या ताप का कष्ट नहीं है और न ही कोई थकता है ॥44-46॥   |   mahabharat अध्याय 3.168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन  »  श्लोक 44-46
 
 
श्लोक  3.168.44-46 
गन्धर्वाप्सरसां चैव प्रभावममितौजसाम्।
नन्दनादीनि देवानां वनान्युपवनानि च॥ ४४॥
दर्शयामास मे शीघ्रं मातलि: शक्रसारथि:।
तत: शक्रस्य भवनमपश्यममरावतीम्॥ ४५॥
दिव्यै: कामफलैर्वृक्षै रत्नैश्च समलङ्कृताम्।
न तत्र सूर्यस्तपति न शीतोष्णे न च क्लम:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
मुझे अनन्त कांतिवाले गन्धर्वों और अप्सराओं का प्रभाव भी देखने को मिला । फिर इन्द्रसारथि मातलि ने शीघ्र ही मुझे नंदन आदि देवताओं के वन और उद्यान दिखाए । तत्पश्चात मैंने अमरावतीपुरी और इन्द्रभवन देखे । वह नगर दिव्य वृक्षों और रत्नों से सुशोभित था, जो इच्छानुसार फल देने वाले थे । वहाँ सूर्य का ताप नहीं है, शीत या ताप का कष्ट नहीं है और न ही कोई थकता है ॥44-46॥
 
I also got to see the effect of the infinitely radiant Gandharvas and Apsaras. Then Indrasarathi Matali soon showed me the forests and gardens of the gods like Nandan etc. After that I saw Amaravatipuri and Indrabhavan. That city was decorated with divine trees and gems which yielded fruits as per the wish. There is no heat of the sun there, there is no pain of cold or heat and no one gets tired. ॥ 44-46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)