Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.168.39-40: हे कुरुवंश में श्रेष्ठ भरत! मैंने सदैव देखा है कि जब घोड़े पहली बार उड़ते हैं, तब देवताओं के राजा इन्द्र भी अविचलित नहीं रह पाते। किन्तु आप रथ के चक्कर लगाते समय भी स्थिर बैठे रहते हैं। ॥39-40॥ | mahabharat अध्याय 3.168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
देवराजोऽपि हि मया नित्यमत्रोपलक्षित:॥ ३९॥
विचलन् प्रथमोत्पाते हयानां भरतर्षभ।
त्वं पुन: स्थित एवात्र रथे भ्रान्ते कुरूद्वह॥ ४०॥
अनुवाद
हे कुरुवंश में श्रेष्ठ भरत! मैंने सदैव देखा है कि जब घोड़े पहली बार उड़ते हैं, तब देवताओं के राजा इन्द्र भी अविचलित नहीं रह पाते। किन्तु आप रथ के चक्कर लगाते समय भी स्थिर बैठे रहते हैं। ॥39-40॥
'O Bharata, the best among the Kuru clan! I have always observed that when the horses take flight for the first time, even the king of the gods, Indra, cannot remain unperturbed. But you sit steadily even when the chariot is moving in circles. ॥ 39-40॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥