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mahabharat 3.168.32: तत्पश्चात्, कुछ ही देर में मैंने वहाँ देवराज इन्द्र का हरे घोड़ों द्वारा खींचा हुआ रथ देखा। हे राजन! उस दिव्य, जादुई और पवित्र रथ को मातलिके चला रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 3.168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.168.32 
अथापश्यं हरियुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम्।
दिव्यं मायामयं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, कुछ ही देर में मैंने वहाँ देवराज इन्द्र का हरे घोड़ों द्वारा खींचा हुआ रथ देखा। हे राजन! उस दिव्य, जादुई और पवित्र रथ को मातलिके चला रहे थे।
 
Thereafter, in a short while, I saw the chariot of Devraja Indra drawn by green horses present there. O King! That divine, magical and sacred chariot was controlled by Matalike.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)