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mahabharat 3.168.17: तब मैंने एकाग्र मन से उन महान देवताओं को प्रणाम किया और उनसे उत्तम प्रकार से महान दिव्यास्त्र प्राप्त किए॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 168: अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.168.17 
ततोऽहं प्रयतो भूत्वा प्रणिपत्य सुरर्षभान्।
प्रत्यगृह्णं तदास्त्राणि महान्ति विधिवद् विभो॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तब मैंने एकाग्र मन से उन महान देवताओं को प्रणाम किया और उनसे उत्तम प्रकार से महान दिव्यास्त्र प्राप्त किए॥17॥
 
Lord! Then, with a concentrated mind, I paid obeisance to those great gods and obtained the greatest divine weapons from them in the most correct manner. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)