श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 55-57
 
 
श्लोक  3.167.55-57 
उत्सादनममित्राणां परसेनानिकर्तनम्॥ ५५॥
दुरासदं दुष्प्रसहं सुरदानवराक्षसै:।
अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम्॥ ५६॥
प्रेक्षतश्चैव मे देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
वे शत्रुओं का नाश करने वाले तथा विरोधियों की सेना का नाश करने वाले हैं। उन्हें प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। किसी भी देवता, दानव या राक्षस के लिए उनका तेज सहन करना अत्यंत कठिन है। तब भगवान शिव की आज्ञा से मैं वहाँ विराजमान हो गया और वे मेरी आँखों के सामने से अदृश्य हो गए। 55-57
 
He is the destroyer of enemies and destroyer of the army of opponents. It is very difficult to attain him. It is very difficult for any deity, demon or devil to bear his speed. Then on the orders of Lord Shiva, I sat there and he disappeared in front of my eyes. 55-57.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि गन्धमादनवासे युधिष्ठिरार्जुनसंवादे सप्तषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें गन्धमादननिवासकालिक युधिष्ठिर-अर्जुन-संवादविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)