Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.167.48-50: मेरा मन अस्त्र-शस्त्रों में लगा हुआ था। उस समय मैंने हाथ जोड़कर भगवान शंकर को मन ही मन प्रणाम किया और यह कहा - 'यदि प्रभु मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरा अभीष्ट वर इस प्रकार है - मैं देवताओं के पास जितने भी दिव्यास्त्र हैं, उन सब को जानना चाहता हूँ।' यह सुनकर भगवान शंकर ने मुझसे कहा - 'हे पाण्डुपुत्र! मैं तुम्हें समस्त दिव्यास्त्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद देता हूँ।' 48-50। | mahabharat अध्याय 3.167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मेरा मन अस्त्र-शस्त्रों में लगा हुआ था। उस समय मैंने हाथ जोड़कर भगवान शंकर को मन ही मन प्रणाम किया और यह कहा - 'यदि प्रभु मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरा अभीष्ट वर इस प्रकार है - मैं देवताओं के पास जितने भी दिव्यास्त्र हैं, उन सब को जानना चाहता हूँ।' यह सुनकर भगवान शंकर ने मुझसे कहा - 'हे पाण्डुपुत्र! मैं तुम्हें समस्त दिव्यास्त्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद देता हूँ।' 48-50।
My mind was engaged in weapons. At that time I folded my hands and mentally saluted Lord Shankar and said this - 'If the Lord is pleased with me, then my desired boon is as follows - I want to know all the divine weapons that the gods have.' Hearing this, Lord Shankar said to me - 'O son of Pandu! I bless you with the attainment of all the divine weapons. 48-50.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥