Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.167.44-45: इस प्रकार उमा के साथ भगवान वृषभध्वज साक्षात दर्शन दिए। वे अपने अंगों में सर्प और हाथ में पिनाक धारण किए हुए थे। भगवान शूलपाणि अनेक रूप धारण करके उस रणभूमि में मेरे पास आए और पूर्ववत् मेरे सामने खड़े होकर बोले - 'परंतप! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ ॥44-45॥ | mahabharat अध्याय 3.167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अदृश्यत तत: साक्षाद् भगवान् गोवृषध्वज:।
उमासहायो व्यालधृग् बहुरूप: पिनाकधृक्॥ ४४॥
स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम्।
शूलपाणिरथोवाच तुष्टोऽस्मीति परंतप॥ ४५॥
अनुवाद
इस प्रकार उमा के साथ भगवान वृषभध्वज साक्षात दर्शन दिए। वे अपने अंगों में सर्प और हाथ में पिनाक धारण किए हुए थे। भगवान शूलपाणि अनेक रूप धारण करके उस रणभूमि में मेरे पास आए और पूर्ववत् मेरे सामने खड़े होकर बोले - 'परंतप! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ ॥44-45॥
In this way, Lord Vrishabhadhwaj was seen in person along with Uma. He was holding a snake in his limbs and Pinaka in his hand. Lord Shulpani, taking many forms, came near me in that battlefield and stood in front of me as before and said – 'Parantap! I am satisfied with you. 44-45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥