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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.167.37 
तदप्यस्त्रं महातेजा: क्षणेनैव व्यशातयत्।
ब्रह्मास्त्रे तु हते राजन् भयं मां महदाविशत्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
परन्तु उस महाप्रतापी योद्धा ने क्षण भर में ही मेरे ब्रह्मास्त्र का नाश कर दिया। हे राजन! उस ब्रह्मास्त्र के नष्ट हो जाने पर मेरे मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया।
 
But that great and illustrious warrior within a moment put an end to my Brahmastra. O King! When that Brahmastra was destroyed, great fear entered my mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)