श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.167.32 
भूय एव महाराज सविशेषमहं तत:।
अस्त्रपूगेन महता रणे भूतमवाकिरम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! तब मैंने पुनः विशेष प्रयत्न करके युद्धस्थल में उस अद्भुत किरातरूपी पुरुष पर बहुत-से अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा की।
 
Maharaj! Then I again made special efforts and showered a huge number of weapons on that wonderful person in the form of Kirat in the battlefield. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)