श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.167.25 
ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरै:।
तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर उस भील ने मुझ पर बड़े-बड़े बाणों की वर्षा की, जैसे पर्वत पर वर्षा होती है; फिर मैंने भी भारी बाणों की वर्षा करके उसे सब ओर से ढक दिया।
 
Having said this, the Bhil showered me with huge arrows, just as it rains on a mountain; then I too showered heavy arrows and covered him from all sides.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)