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mahabharat 3.167.11: काम्यक वन से चलकर, पूर्ण आशा के साथ तपस्या करते हुए मैं भृगुतुंग पर्वत पर पहुँचा। वहाँ एक रात्रि विश्राम करने के बाद, जब मैं आगे बढ़ा, तो मार्ग में मुझे एक ब्राह्मण देवता दिखाई दिया।   |   mahabharat अध्याय 3.167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 167: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.167.11 
भृगुतुङ्गमथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तप:।
एकरात्रोषित: कञ्चिदपश्यं ब्राह्मणं पथि॥ ११॥
 
 
अनुवाद
काम्यक वन से चलकर, पूर्ण आशा के साथ तपस्या करते हुए मैं भृगुतुंग पर्वत पर पहुँचा। वहाँ एक रात्रि विश्राम करने के बाद, जब मैं आगे बढ़ा, तो मार्ग में मुझे एक ब्राह्मण देवता दिखाई दिया।
 
Starting from the Kamyak forest, with full hope in austerity, I reached the Bhrigutunga mountain. After staying there for a night, when I proceeded further, I saw a Brahmin god on the way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)