श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 166: इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.166.16-17 
धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम्।
शक्रेण य इदं विद्वानधीयीत समाहित:॥ १६॥
संवत्सरं ब्रह्मचारी नियत: संशितव्रत:।
स जीवेद्धि निराबाध: स सुखी शरदां शतम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान् मनुष्य प्रतिदिन कोषाध्यक्ष कुबेर के घर में निवास करते समय पाण्डवों की इन्द्र से हुई भेंट की कथा को एकाग्रतापूर्वक पढ़ता है, तथा नियम और अनुशासन का पालन करते हुए कठोर व्रत का सहारा लेता है और एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर सौ वर्षों तक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।
 
A learned man who daily reads with concentration the story of the meeting of the Pandavas with Indra while they were staying in the house of the treasurer Kubera, and who, following discipline and rules, takes the help of a strict fast and observes celibacy for a year, will be free from all kinds of obstacles and live a happy life for a hundred years.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकचवयुद्धपर्वणि इन्द्रागमने षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १६६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें इन्द्रागमनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६६॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)