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mahabharat 3.165.9: मातलि ने भी पाण्डवों का स्वागत किया और उन्हें उनके कर्तव्य सिखाकर, जैसे एक पिता अपने पुत्र को निर्देश देता है, वे पुनः अपने अद्वितीय और चमकते रथ पर सवार होकर स्वर्ग के स्वामी इन्द्र के पास गये।   |   mahabharat अध्याय 3.165: अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 165: अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.165.9 
तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्दत्
पितेव पुत्राननुशिष्य पार्थान्।
ययौ रथेनाप्रतिमप्रभेण
पुन: सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य॥ ९॥
 
 
अनुवाद
मातलि ने भी पाण्डवों का स्वागत किया और उन्हें उनके कर्तव्य सिखाकर, जैसे एक पिता अपने पुत्र को निर्देश देता है, वे पुनः अपने अद्वितीय और चमकते रथ पर सवार होकर स्वर्ग के स्वामी इन्द्र के पास गये।
 
Matali also welcomed the Pandavas and after teaching them their duties just as a father instructs his son, he again went to Indra, the Lord of heaven, in his matchless and shining chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)