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mahabharat 3.165.4-5: पर्वत पर पहुँचकर बुद्धिमान किरीटधारी अर्जुन देवराज इन्द्र के दिव्य रथ से उतरे। उस समय सबसे पहले उन्होंने महर्षि धौम्य के दोनों चरणों में सिर नवाया। तत्पश्चात अजातशत्रु ने युधिष्ठिर और भीमसेन के चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद नकुल और सहदेव ने आकर अर्जुन को प्रणाम किया, तत्पश्चात अर्जुन ने द्रौपदी से मिलकर उन्हें बहुत-बहुत आश्वासन दिया और अपने भाई युधिष्ठिर के पास आकर विनम्रतापूर्वक खड़े हो गए।   |   mahabharat अध्याय 3.165: अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 165: अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.165.4-5 
स शैलमासाद्य किरीटमाली
महेन्द्रवाहादवरुह्य तस्मात्।
धौम्यस्य पादावभिवाद्य धीमा-
नजातशत्रोस्तदनन्तरं च॥ ४॥
वृकोदरस्यापि च वन्द्यपादौ
माद्रीसुताभ्यामभिवादितश्च।
समेत्य कृष्णां परिसान्त्व्य चैनां
प्रह्वोऽभवद् भ्रातुरुपह्वरे स:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पर्वत पर पहुँचकर बुद्धिमान किरीटधारी अर्जुन देवराज इन्द्र के दिव्य रथ से उतरे। उस समय सबसे पहले उन्होंने महर्षि धौम्य के दोनों चरणों में सिर नवाया। तत्पश्चात अजातशत्रु ने युधिष्ठिर और भीमसेन के चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद नकुल और सहदेव ने आकर अर्जुन को प्रणाम किया, तत्पश्चात अर्जुन ने द्रौपदी से मिलकर उन्हें बहुत-बहुत आश्वासन दिया और अपने भाई युधिष्ठिर के पास आकर विनम्रतापूर्वक खड़े हो गए।
 
After reaching the mountain, the wise crowned Arjun got down from the divine chariot of Devraj Indra. At that time, first of all he bowed his head at both the feet of Maharishi Dhaumya. Thereafter, Ajatashatru bowed at the feet of Yudhishthir and Bhimsen. After this, Nakul and Sahadeva came and saluted Arjun, after that Arjun met Draupadi and gave him a lot of assurance and after coming near his brother Yudhishthir, he stood with humility. 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)