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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 165: अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.165.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: कदाचिद्धरिसम्प्रयुक्तं
महेन्द्रवाहं सहसोपयातम्।
विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां
हर्षोऽर्जुनं चिन्तयतां बभूव॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! तत्पश्चात, हरे घोड़ों द्वारा खींचा हुआ देवराज इन्द्र का रथ सहसा आकाश में प्रकट हुआ, मानो बिजली चमक गई हो। उसे देखकर अर्जुन का ध्यान करने वाले पराक्रमी पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए।
 
Vaishampayana says, 'O Janamejaya! Thereafter, the chariot of Devraja Indra, drawn by green horses, suddenly appeared in the sky, as if lightning had flashed. On seeing it, the mighty Pandavas, who were thinking of Arjuna, were very happy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)