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mahabharat 3.164.7: अनेक रंगों वाले विशाल सुगन्धित वृक्षों और मेघों से आच्छादित उस पर्वत शिखर पर विचरण करते हुए, सदैव तपस्या में लगे रहने वाले पाण्डव उस पर्वत के महत्व का चिन्तन नहीं कर पाए ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 3.164: पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 164: पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.164.7 
अनेकवर्णैश्च सुगन्धिभिश्च
महाद्रुमै: संततमभ्रजालै:।
तप:प्रधाना: सततं चरन्त:
शृङ्गं गिरेश्चिन्तयितुं न शेकु:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
अनेक रंगों वाले विशाल सुगन्धित वृक्षों और मेघों से आच्छादित उस पर्वत शिखर पर विचरण करते हुए, सदैव तपस्या में लगे रहने वाले पाण्डव उस पर्वत के महत्व का चिन्तन नहीं कर पाए ॥7॥
 
While roaming on that mountain peak which was covered with huge fragrant trees of many colours and clouds, the Pandavas who were always engaged in austerities were not able to contemplate the significance of that mountain. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)