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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.163.5 
इन्द्रवैश्रवणावेतां दिशं पाण्डव रक्षत:।
पर्वतैश्च वनान्तैश्च काननैश्चैव शोभिताम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'पाण्डुनन्दन! पर्वतों, वन-प्रदेशों और वनों से सुशोभित यह पूर्व दिशा इन्द्र और कुबेर द्वारा रक्षित है।
 
'Pandunandan! This eastern direction, adorned with mountains, forest areas and forests, is protected by Indra and Kuber.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)