श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.163.4 
असौ सागरपर्यन्तां भूमिमावृत्य तिष्ठति।
शैलराजो महाराज मन्दरोऽति विराजते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'महाराज! समुद्र पर्यन्त भूमि को घेरे हुए खड़ा हुआ महान् मंदराचल पर्वत चमक रहा है ॥4॥
 
'Maharaj! The great mountain Mandaraachal, which stands encircling the land up to the sea, is shining. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)