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mahabharat 3.163.30-31: तत्पश्चात् सूर्यास्त के समय तथा संध्या की सीमा को पार करके ये भगवान सूर्यदेव उत्तर दिशा में आश्रय लेते हैं। पाण्डुनन्दन! मेरु पर्वत का अनुसरण करके तथा उत्तर सीमा पर पहुँचकर, समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भगवान सूर्यदेव पुनः पूर्व दिशा की ओर मुख करके चलते हैं। 30-31॥   |   mahabharat अध्याय 3.163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  3.163.30-31 
अस्तं प्राप्य तत: संध्यामतिक्रम्य दिवाकर:।
उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसु:॥ ३०॥
स मेरुमनुवृत्त: सन् पुनर्गच्छति पाण्डव।
प्राङ्मुख: सविता देव: सर्वभूतहिते रत:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् सूर्यास्त के समय तथा संध्या की सीमा को पार करके ये भगवान सूर्यदेव उत्तर दिशा में आश्रय लेते हैं। पाण्डुनन्दन! मेरु पर्वत का अनुसरण करके तथा उत्तर सीमा पर पहुँचकर, समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भगवान सूर्यदेव पुनः पूर्व दिशा की ओर मुख करके चलते हैं। 30-31॥
 
'After that, after reaching sunset and crossing the boundary of evening, this Lord Sun takes shelter in the north direction. Pandunandan! After following Mount Meru and reaching the northern limit, Lord Surya, who is always ready for the welfare of all living beings, again moves facing east. 30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)