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mahabharat 3.163.24-25: 'भारत! जो योगसिद्ध महात्मा महान तप से धन्य हैं और पुण्य कर्मों से पवित्र हो गए हैं, वे अज्ञान और मोह से मुक्त योगसिद्ध महात्मा उस नारायण धाम को जाते हैं और फिर इस संसार में कभी नहीं लौटते। अपितु स्वयंभू और सनातन परमेश्वर, देवी-देवता, विष्णु में ही लीन हो जाते हैं। 24-25॥   |   mahabharat अध्याय 3.163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 163: धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  3.163.24-25 
परेण तपसा युक्ता भाविता: कर्मभि: शुभै:।
योगसिद्धा महात्मानस्तमोमोहविवर्जिता:॥ २४॥
तत्र गत्वा पुनर्नेमं लोकमायान्ति भारत।
स्वयम्भुवं महात्मानं देवदेवं सनातनम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'भारत! जो योगसिद्ध महात्मा महान तप से धन्य हैं और पुण्य कर्मों से पवित्र हो गए हैं, वे अज्ञान और मोह से मुक्त योगसिद्ध महात्मा उस नारायण धाम को जाते हैं और फिर इस संसार में कभी नहीं लौटते। अपितु स्वयंभू और सनातन परमेश्वर, देवी-देवता, विष्णु में ही लीन हो जाते हैं। 24-25॥
 
'India! Those Yogsiddha Mahatmas who are blessed with great penance and have become pure by performing virtuous deeds, those Yogsiddh Mahatmas who are free from ignorance and delusion, go to that Narayana-dham and never return to this world. Rather, the self-existent and eternal God, the Gods and Goddesses, get merged into Vishnu. 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)