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mahabharat 3.162.6: जो क्रोध के वश में होकर अपना पतन नहीं देखता, वह पापयुक्त मनवाला पापी मनुष्य पाप का ही अनुसरण करता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 3.162: कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 162: कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.162.6 
यस्तु केवलसंरम्भात् प्रपातं न निरीक्षते।
पापात्मा पापबुद्धिर्य: पापमेवानुवर्तते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो क्रोध के वश में होकर अपना पतन नहीं देखता, वह पापयुक्त मनवाला पापी मनुष्य पाप का ही अनुसरण करता है ॥6॥
 
He who is under the influence of anger and does not see his own downfall, that sinful man with a sinful mind only follows sin. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)