श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 162: कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  3.162.37-38 
तेषां हि शापकाल: स कृतोऽगस्त्येन धीमता।
समरे निहतास्तस्माच्छापस्यान्तोऽभवत् तदा॥ ३७॥
पाण्डवाश्च महात्मानस्तेषु वेश्मसु तां क्षपाम्।
सुखमूषुर्गतोद्वेगा: पूजिता: सर्वराक्षसै:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान अगस्त्य ने यक्षों के लिए भी यही शाप अवधि निर्धारित की थी। युद्ध में मारे जाने पर उनका शाप समाप्त हो गया। महामनस्वी पांडव समस्त राक्षसों द्वारा पूजित और निश्चिंत होकर अपने आश्रमों में रात्रि बिताने लगे। 37-38.
 
The wise Agastya had fixed the same period of curse for the Yakshas. When they were killed in the war, their curse came to an end. The great-minded Pandavas started spending their nights in their ashrams, worshipped by all the demons and without any anxiety. 37-38.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि कुबेरवाक्ये द्विषष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें कुबेरवाक्यविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६२॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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