श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 162: कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.162.27-28 
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं धनदेन प्रभाषितम्।
पाण्डवाश्च ततस्तेन वभूवु: सम्प्रहर्षिता:॥ २७॥
तत: शक्तिं गदां खड्गं धनुश्च भरतर्षभ:।
प्राध्वं कृत्वा नमश्चक्रे कुबेराय वृकोदर:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! कुबेर के ये वचन सुनकर पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् भरतवंशी भीमसेन ने गदा, तलवार और धनुष नीचे करके कुबेर को प्रणाम किया।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! The Pandavas were very pleased to hear these words spoken by Kubera. Thereafter, Bharata clan's jewel Bhimasena lowered the raised mace, sword and bow and saluted Kubera.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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