श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 162: कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.162.21 
न मोहात् कुरुते जिष्णु: कर्म पाण्डव गर्हितम्।
न पार्थस्य मृषोक्तानि कथयन्ति नरा नृषु॥ २१॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! आपका भाई अर्जुन आसक्तिवश कभी कोई निन्दनीय कार्य नहीं करता। लोग आपस में कभी अर्जुन के मिथ्या भाषण की चर्चा नहीं करते। 21॥
 
Pandunandan! Your brother Arjun never does any condemnable act out of attachment. People never discuss Arjuna's false speech among themselves. 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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