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mahabharat 3.161.58-59: राजन! उसे देखकर मेरे एक मित्र राक्षसराज श्री मणिमान् ने अपनी मूर्खता, अज्ञान, अभिमान और मोह के कारण आकाश से उस महामुनि के सिर पर थूका। फिर मानो क्रोध से सम्पूर्ण दिशाओं को दग्ध कर रहा हो, वह मुझसे इस प्रकार बोला -॥58-59॥   |   mahabharat अध्याय 3.161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  3.161.58-59 
राक्षसाधिपति: श्रीमान् मणिमान्नाम मे सखा।
मौर्ख्यादज्ञानभावाच्च दर्पान्मोहाच्च पार्थिव॥ ५८॥
न्यष्ठीवदाकाशगतो महर्षेस्तस्य मूर्धनि।
स कोपान्मामुवाचेदं दिश: सर्वा दहन्निव॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
राजन! उसे देखकर मेरे एक मित्र राक्षसराज श्री मणिमान् ने अपनी मूर्खता, अज्ञान, अभिमान और मोह के कारण आकाश से उस महामुनि के सिर पर थूका। फिर मानो क्रोध से सम्पूर्ण दिशाओं को दग्ध कर रहा हो, वह मुझसे इस प्रकार बोला -॥58-59॥
 
King! On seeing him, one of my friends, the demon king Shri Maniman, due to his foolishness, ignorance, pride and delusion, spat on the head of that great sage from the sky. Then, as if burning all directions with anger, he spoke to me thus -॥ 58-59॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)