श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.161.57 
तमूर्ध्वबाहुं दृष्ट्वैव सूर्यस्याभिमुखे स्थितम्।
तेजोराशिं दीप्यमानं हुताशनमिवैधितम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
महर्षि अगस्त्य अपनी भुजाएँ ऊपर उठाए सूर्य की ओर मुख किए खड़े थे। वे तेजस्वी महात्मा प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहे थे।
 
Maharishi Agastya was standing with his arms raised and facing the Sun. That radiant Mahatma was glowing like a blazing fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)