श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 161: कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.161.45 
व्रीडा चात्र न कर्तव्या साहसं यदिदं कृतम्।
दृष्टश्चापि सुरै: पूर्वं विनाशो यक्षरक्षसाम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
'भीमसेन! तुम्हें इस दुस्साहसपूर्ण कार्य से लज्जित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यक्षों और राक्षसों का विनाश तो देवताओं को पहले ही दिखाई दे रहा था ॥ 45॥
 
'Bheemasena, you should not be ashamed of this daring act, because the destruction of the Yakshas and the demons was already visible to the gods. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)